हरिद्वार के प्राइम लोकेशन पर स्थित प्रतिष्ठित ‘होटल अलकनंदा’ को PPP मोड पर देने के लिए उत्तराखंड इन्वेस्टमेंट एंड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट बोर्ड (UIIDB) द्वारा जारी टेंडर विवादों के घेरे में आ गया है। टेंडर दस्तावेज में दर्ज तकनीकी योग्यताओं की कड़ी और असामान्य शर्तों ने प्रदेश के प्रशासनिक और व्यापारिक गलियारों में चर्चा और संदेह को जन्म दे दिया है।
किसके लिए बिछाया गया लाल कालीन? (किसे होगा फायदा)
टेंडर के ‘Criteria B’ में साफ लिखा गया है कि बोलीदाता या उसके साथ टाई-अप करने वाले ब्रांड के पास 60 से अधिक देशों में मौजूदगी और कम से कम 2,000 कमरों के प्रबंधन का अनुभव होना चाहिए।

विदेशी MNCs को सीधी एंट्री: इस एक शर्त ने देश-विदेश के गिने-चुने बहुराष्ट्रीय (MNC) हॉस्पिटैलिटी दिग्गजों जैसे मैरियट, हिल्टन, आदि के लिए पूरी तरह रास्ता साफ कर दिया है।
चुनिंदा प्लेयर्स को लाभ: आशंका जताई जा रही है कि शर्त इतनी विशिष्ट (Specific) है कि यह किसी खास बड़े समूह या उससे टाई-अप करने वाली कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए प्रतीत होती है।
टेंडर और सरकारी नीति की प्रमुख कमियां
भारतीय हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री की उपेक्षा: भारत में दर्जनों ऐसे प्रतिष्ठित होटल समूह हैं जिनके पास दशकों का अनुभव, बेहतरीन सर्विस और विशाल वित्तीय क्षमता है, लेकिन 60 देशों में मौजूदगी न होने के कारण वे इस बोली से सीधे बाहर हो गए हैं।

स्वदेशी और स्थानीय उद्यमियों की अनदेखी: ‘वोकल फॉर लोकल’ और ‘मेक इन इंडिया’ का नारा देने वाली व्यवस्था में उत्तराखंड के स्थानीय होटल कारोबारियों और भारतीय निवेशकों के लिए प्रतिस्पर्धा के दरवाजे पूरी तरह बंद कर दिए गए हैं।
जब टेंडर की शर्तें इतनी कठिन होंगी कि केवल 1 या 2 बड़ी कंपनियां ही पात्र होंगी, तो स्वस्थ प्रतिस्पर्धा खत्म हो जाएगी। इससे राज्य सरकार को मिलने वाले राजस्व और रॉयल्टी के नुकसान की पूरी संभावना रहती है।
सार्वजनिक संपत्ति के मूल्यांकन पर सवाल: हरिद्वार में गंगा किनारे स्थित अलकनंदा जैसी कीमती और रणनीतिक सरकारी संपत्ति को इतनी सीमित प्रतिस्पर्धा के बीच निजी हाथों में सौंपना नीतिगत पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
बड़ा सवाल: क्या संशोधित होंगी टेंडर शर्तें?
1.10 करोड़ रुपये की ईएमडी वाले इस टेंडर में ’60 देशों’ की शर्त लगाने का तार्किक आधार क्या है? क्या हरिद्वार जैसे धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र में होटल चलाने के लिए वैश्विक नेटवर्क की शर्त लगाना जायज है या इसके पीछे कोई पसंदीदा बोलीदाता है? अब देखना यह होगा कि उठ रहे सवालों के बीच सरकार इन शर्तों पर पुनर्विचार करती है या टेंडर प्रक्रिया इसी ढर्रे पर आगे बढ़ेगी।
